Sunday, November 10, 2013

जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी

ख़ौफ़ कब तक भेड़ियोँ से खायेगा
मेमना ख़ुद भेड़िया बन जायेगा


झूठ मुझको देखकर मुस्कायेगा
सच मुझे सूली पे जब चढ़वायेगा


जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी
मौत रुक जाये तो दम घुट जायेगा



तीरगी से जंग कर के इक दिया
गोद मेँ फिर सुब्ह की सो जायेगा


अब तभी मैँ पास उसके जाऊँगा
जब वही लेने मुझे ख़ुद आयेगा


भूख होटोँ पर लिये निकलेगा दम
गर मेरे हिस्से की रोटी खायेगा


यूँ लगा मुर्दे ने मानो ये कहा
जा रहा हूँ आज कल तू आयेगा


सौपकर दीवान दुनिया को सिराज
मीर के कदमोँ तले सो जायेगा

के ग़म शे'र बन के निकलते रहे

बुरे और भले लोग मिलते रहे
के मिलते हुये सब से चलते रहे

ज़माने मेँ कोई भी अपना नहीँ
परत दर परत राज़ खुलते रहे

बने चाँद तो अब्र ने ढक लिया
जो सूरज बने हाय! जलते रहे

किसी रहगुज़र पे भी साया न था
बदन मोम जैसे पिघलते रहे

मोहब्बत, ग़ज़ल, दोस्ती, दुश्मनी
जवानी के दिन यूँ निकलते रहे

उन्हेँ ज़िद थी वो छत पे आये नहीँ
हमेँ ज़िद थी हम भी टहलते रहे

मैँ ग़म मेँ भी ख़ुश हो के जीता रहा
पड़ोसी मेरे मुझसे जलते रहे

सितारा कोई छू न पाये मगर
तमन्नाओँ के पर निकलते रहे

ग़ज़ल तेरा दामन हमेँ मिल गया
के ग़म शे'र बन के निकलते रहे

आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है

छोड़कर सारे कारवाँ हमने
ख़ुद लिखी अपनी दास्ताँ हमने

बन गया वो मेरा बवाले जाँ
जिसको समझा था अपनी जाँ हमने

आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है
ख़ुद ही फूँका है ये जहाँ हमने

वापसी की कोई डगर है क्या
कुछ भी छोड़ा है क्या यहाँ हमने

झूठ कहने की आई मजबूरी
काटकर फेँक दी ज़ुबाँ हमने

सबकी दस्तार आ गिरी "फ़ैसल"
पाँव रक्खा जहाँ जहाँ हमने

प्यार बस एक बार होता है

इश्क़ मेँ गर नशा नहीँ होता
तो  कोई बावला नहीँ होता

जब तुम्हीँ डर गयीँ ज़माने से
अब मेरा हौसला नहीँ होता

तब नये रास्ते निकलते हैँ
जब कोई रास्ता नहीँ होता

इश्क में जीतना तो दीगर है
हारना भी बुरा नहीँ  होता

उँगलियाँ ये मिसाल देती हैँ
हर कोई एक सा नहीँ होता

पार तुझको ज़रूर ले जाता
ख़ुद अगर डूबता नहीँ होता

सबमें मर्ज़ी ख़ुदा की होती है
यूँ कोई सिलसिला नहीँ होता

प्यार बस एक बार होता है
दूसरा, तीसरा नहीँ होता

जो कुछ भी खोया है पाया जा सकता है

आख़िर कब तक झूठ छुपाया जा सकता है
कब तक ये धंधा चमकाया जा सकता है

माना फूल का रस किस्मत मेँ नहीँ हमारी
आजू बाजू तो मँडराया जा सकता है

चाँद जो रुठा रातेँ काली हो सकती हैँ
सूरज रुठ गया तो साया जा सकता है

मँहगा पड़ सकता है हद से आगे जाना
रुसवा कर के पीछे लाया जा सकता है

मज़लूमोँ का ख़ून बहाते रहते हैँ जो
उनका भी तो ख़ून बहाया जा सकता है

बात अगर दुश्मन को डसवाने की हो तो
साँपोँ को भी दूध पिलाया जा सकता है

हिम्मत हो गर दिल मेँ तो कुछ भी मुमकिन है
जो कुछ भी खोया है पाया जा सकता है

सच्चाई का परचम लेकर फिरते हो तुम
तुमको सूली पर लटकाया जा सकता है

कब तक धोखा दे सकते हैँ आइने को
कब तक ये चेहरा चमकाया जा सकता है

पाप सभी कुटिया के भीतर हो सकते हैँ
हुजरे के अन्दर सब खाया जा सकता

कोई मुझसे भी अच्छा मिल गया तो

उसे पाने की करते हो दुआ तो 
मगर उस से भी कल जी भर गया तो 
यक़ीनन आज हम इक साथ होते 
अगर करते ज़रा सा हौसला तो 
चले हो रहनुमा कर, इल्म को तुम 
तुम्हेँ इस इल्म ने भटका दिया तो 
समझ सकते हो क्या अंजाम होगा 
तुम्हारे वार से वो बच गया तो
 बहोत मसरुफ था महफ़िल मेँ माना 
नहीँ कुछ बोलता पर देखता तो
 किसी को चाहती है पूछ लूँ क्या 
जवाब इसका मगर हाँ मेँ मिला तो
 मैँ अच्छा हूँ तभी अपना रही हो 
कोई मुझसे भी अच्छा मिल गया तो 
बहोत नज़दीक मत आया करो तुम 
कहीँ कुछ हो गयी हमसे ख़ता तो 
बहोत से काम कल करने हैँ मुझको 
मगर अय ज़िन्दगी कल न हुआ तो 
ग़ुलामी मेँ जकड़ लेगा कोई फिर 
वतन ऐसे ही गर लुटता रहा तो 
मुझे फिर कौन मारेगा बताओ
 ग़मे हिज्राँ ने भी ठुकरा दिया तो