Sunday, November 10, 2013

आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है

छोड़कर सारे कारवाँ हमने
ख़ुद लिखी अपनी दास्ताँ हमने

बन गया वो मेरा बवाले जाँ
जिसको समझा था अपनी जाँ हमने

आग नफ़रत की ख़ुद लगायी है
ख़ुद ही फूँका है ये जहाँ हमने

वापसी की कोई डगर है क्या
कुछ भी छोड़ा है क्या यहाँ हमने

झूठ कहने की आई मजबूरी
काटकर फेँक दी ज़ुबाँ हमने

सबकी दस्तार आ गिरी "फ़ैसल"
पाँव रक्खा जहाँ जहाँ हमने

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