Sunday, November 10, 2013

जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी

ख़ौफ़ कब तक भेड़ियोँ से खायेगा
मेमना ख़ुद भेड़िया बन जायेगा


झूठ मुझको देखकर मुस्कायेगा
सच मुझे सूली पे जब चढ़वायेगा


जिस फ़ज़ा मेँ जी रही है ज़िन्दगी
मौत रुक जाये तो दम घुट जायेगा



तीरगी से जंग कर के इक दिया
गोद मेँ फिर सुब्ह की सो जायेगा


अब तभी मैँ पास उसके जाऊँगा
जब वही लेने मुझे ख़ुद आयेगा


भूख होटोँ पर लिये निकलेगा दम
गर मेरे हिस्से की रोटी खायेगा


यूँ लगा मुर्दे ने मानो ये कहा
जा रहा हूँ आज कल तू आयेगा


सौपकर दीवान दुनिया को सिराज
मीर के कदमोँ तले सो जायेगा

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