Sunday, November 10, 2013

के ग़म शे'र बन के निकलते रहे

बुरे और भले लोग मिलते रहे
के मिलते हुये सब से चलते रहे

ज़माने मेँ कोई भी अपना नहीँ
परत दर परत राज़ खुलते रहे

बने चाँद तो अब्र ने ढक लिया
जो सूरज बने हाय! जलते रहे

किसी रहगुज़र पे भी साया न था
बदन मोम जैसे पिघलते रहे

मोहब्बत, ग़ज़ल, दोस्ती, दुश्मनी
जवानी के दिन यूँ निकलते रहे

उन्हेँ ज़िद थी वो छत पे आये नहीँ
हमेँ ज़िद थी हम भी टहलते रहे

मैँ ग़म मेँ भी ख़ुश हो के जीता रहा
पड़ोसी मेरे मुझसे जलते रहे

सितारा कोई छू न पाये मगर
तमन्नाओँ के पर निकलते रहे

ग़ज़ल तेरा दामन हमेँ मिल गया
के ग़म शे'र बन के निकलते रहे

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